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11 औषधियों के धूपन से वायु प्रदूषण के दुष्प्रभाव होते हैं दूर, इंदौर की दो छात्राओं के शोध का CCRAS में चयन

इंदौर: वर्तमान समय में वायु प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुकी है, जिसके कारण श्वसन तंत्र से जुड़ी अनेक बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आयुर्वेदिक औषधियों का उपयोग इन बीमारियों से राहत दिलाने में सहायक हो सकता है। इंदौर के अष्टांग आयुर्वेदिक कालेज की छात्राओं ने एक शोध में यह पाया है कि 11 औषधियों के धूपन से वायु प्रदूषण के दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है।

छात्रा हिमानी सोनी ने 11 औषधियों का किया उल्लेख

यह शोध केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद की स्पार्क (स्टूडेंटशिप प्रोग्राम फार आयुर्वेदा रिसर्च केन) योजना के अंतर्गत किया गया है। इसमें कालेज की दो छात्राओं का शोध चयनित हुआ है। तृतीय वर्ष की छात्रा हिमानी सोनी ने आचार्य सुश्रुत द्वारा बताए गए तरीकों पर शोध किया। हिमानी ने बताया कि आचार्य सुश्रुत ने दो श्लोकों में 11 औषधियों का उल्लेख किया है।

शोध में यह जानने का प्रयास किया गया कि इन औषधियों को हजारों वर्ष पहले क्यों शामिल किया गया था। शोध से यह स्पष्ट हुआ कि ये औषधियां कृमिनाशक और विषनाशक हैं। यदि वायु में सूक्ष्म जीव या विष मौजूद हैं, तो ये औषधियां उनका नाश करती हैं। इस शोध को आज के संदर्भ में जोड़ते हुए बताया गया कि प्रदूषित वायु के सेवन से लंग्स पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

जब इन औषधियों का धूपन (एक आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रक्रिया) किया जाता है, तो यह बाहरी प्रदूषण के साथ-साथ हमारे शरीर में प्रवेश करने वाले सूक्ष्म जीवों से भी लड़ती हैं। इसमें लाक्षा, हल्दी, अतीस, हरितकी, नागरमोथा, हरेणु, एला, तेजपत्र, वक्र, कुष्ठ और प्रियंगु जैसी औषधियां शामिल हैं।

शोध में कुछ व्यक्तियों को एक माह तक 15 मिनट तक धूपन दिया गया, जिससे उनकी ब्रेथ होल्डिंग केपेसिटी में वृद्धि हुई। इससे यह सिद्ध होता है कि प्रदूषित वायु के स्थान पर हम शुद्ध वायु ग्रहण कर सकते हैं और यह प्रक्रिया हम अपने घर के कक्ष में भी कर सकते हैं।

अनुवांशिक मधुमेह के कारणों पर शोध

दूसरी ओर, कालेज की द्वितीय वर्ष की छात्रा अंशिका तोमर ने अनुवांशिक मधुमेह के कारणों पर शोध किया। अंशिका ने बताया कि आयुर्वेद में अनुवांशिक मधुमेह का कारण सात प्रकृति को माना जाता है। शोध में यह पाया गया कि टाइप 2 डायबिटीज एक सामान्य जीवनशैली विकार है, जिसके मुख्य कारण अनुचित आहार-विहार, चयापचय की गड़बड़ी, हार्मोन असंतुलन, मानसिक तनाव और आनुवांशिक कारक हैं।

इन कारणों का निदान पंचक के माध्यम से किया जा सकता है। आयुर्वेद में आचार्यों द्वारा बताया गया है कि संतुलित आहार और जीवनशैली का पालन स्वास्थ्य बनाए रखने और रोगों की रोकथाम के लिए अत्यंत आवश्यक है। शोध में यह भी ज्ञात हुआ कि जो व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुसार पथ्य-अपथ्य का पालन करते हैं, उनमें मधुमेह होने की आशंका कम हो जाती है। यह सिद्ध करता है कि प्रकृति भले ही स्थिर हो, लेकिन जीवनशैली में सुधार कर रोगों की आशंका को कम किया जा सकता है।

देशभर के 300 विद्यार्थियों का हुआ चयन

इन शोधों पर अब राष्ट्रीय स्तर पर कार्य किया जाएगा, जिससे बड़ी संख्या में बीमारियों से पीड़ित मरीजों को लाभ मिलेगा। केंद्रीय स्पार्क योजना के तहत शोध के लिए देशभर के करीब 300 विद्यार्थियों का चयन किया गया है, जिन्हें 50 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि दी जाएगी। देशभर के 539 आयुर्वेदिक कालेजों से हजारों विद्यार्थियों ने शोध के विषय भेजे थे और इन्हें शोध पूरा करने के लिए दो माह का समय दिया गया था।

अधिकारियों ने बताया कि आयुर्वेद की पढ़ाई करने वाले विद्यार्थियों में शोध की रुचि को बढ़ावा देने के लिए केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद ने वर्ष 2022 में स्पार्क योजना शुरू की थी। इसमें विद्यार्थियों को शोध के लिए प्रशिक्षण भी दिया जाता है।

‘आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद की स्पार्क योजना के अंतर्गत इन दो छात्राओं के शोध को पसंद किया गया है। इन शोधों से भविष्य में लोगों को लाभ मिलने की संभावना है।’ – डा. अजीत पाल सिंह चौहान, प्राचार्य, अष्टांग आयुर्वेद कालेज इंदौर

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